**प्राचीन वैदिक काल में सभ्य समाज के संबोधन की परंपरा: 'आर्य' और 'बंधु'**
भारतीय संस्कृति और सभ्यता के इतिहास में वैदिक काल को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यह वह समय था जब समाजिक संरचना, आचार-विचार और संबोधन की परंपराएँ अपने चरम पर थीं। वैदिक समाज की विशेषता यह थी कि उसमें हर व्यक्ति के प्रति आदर और सम्मान का भाव निहित था, और इसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की समृद्ध परंपरा भी थी। समाज में संवाद और संबोधन के लिए जो शब्द प्रचलित थे, उनमें 'आर्य' और 'बंधु' का विशेष स्थान था। इन शब्दों के माध्यम से सामाजिक रिश्तों की गरिमा और परस्पर सम्मान का प्रदर्शन होता था।
### 'आर्य' का अर्थ और महत्व
वैदिक काल में 'आर्य' शब्द का प्रयोग उच्च आदर्शों, नैतिकता और सम्माननीय व्यक्तियों के लिए किया जाता था। 'आर्य' का शाब्दिक अर्थ संस्कृत में 'श्रेष्ठ', 'महान' या 'सभ्य' होता है। यह केवल जाति या वंश तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक गुणात्मक पदवी थी, जिसे व्यक्ति की श्रेष्ठता, शील और सत्कर्मों के आधार पर दिया जाता था। ‘आर्य’ कहलाना सम्मान की बात थी और यह सामाजिक पद और प्रतिष्ठा का प्रतीक था।
वैदिक समाज में गुरु, विद्वान, धर्मगुरु और बड़े-बुजुर्गों को 'आर्य' कहकर संबोधित किया जाता था। यह केवल एक शब्द नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा अर्थ छिपा था। इसके माध्यम से छोटे या शिष्यों द्वारा अपने से बड़े या श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति आदर और सम्मान प्रकट किया जाता था। यह शब्द एक प्रकार का सामाजिक अनुशासन भी स्थापित करता था, जो समाज में शांति और सौहार्द्र बनाए रखने में सहायक था।
### 'बंधु' का प्रयोग और संदर्भ
'बंधु' शब्द का प्रयोग अपने से समकक्ष या छोटों के लिए किया जाता था। 'बंधु' का अर्थ 'भाई', 'मित्र' या 'सहयोगी' होता है। वैदिक काल में, समाजिक रिश्तों को मजबूत और सकारात्मक बनाए रखने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता था। यह केवल रिश्तेदारी तक सीमित नहीं था, बल्कि सभी व्यक्तियों के प्रति भाईचारे और मित्रता का भाव प्रकट करता था। 'बंधु' शब्द व्यक्ति को समानता का बोध कराता था और संवाद में शिष्टाचार बनाए रखने में सहायक होता था।
समाज में परस्पर सौहार्द बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि संवाद में समानता और सम्मान दोनों का ध्यान रखा जाए। 'बंधु' का प्रयोग यह सुनिश्चित करता था कि समाज के सभी वर्गों के बीच एकता और सहिष्णुता का भाव बना रहे। चाहे वह मित्र हो, रिश्तेदार हो या कोई अजनबी—सबको ‘बंधु’ कहकर संबोधित करने से परस्पर सौहार्द और अपनत्व का भाव उत्पन्न होता था।
### स्वामी विवेकानंद और भारतीय संबोधन परंपरा
इस प्राचीन परंपरा का आधुनिक उदाहरण स्वामी विवेकानंद के शिकागो में दिए गए प्रसिद्ध भाषण में देखा जा सकता है, जब उन्होंने सभा को 'मेरे भाइयों और बहनों' के रूप में संबोधित किया। इस संबोधन ने न केवल भारत की सभ्य और विनम्र संवाद परंपरा को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया, बल्कि उनके इस भावपूर्ण उद्घोष ने वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति का गौरव भी बढ़ाया। स्वामी विवेकानंद का यह उद्बोधन हमें यह संदेश देता है कि एक सभ्य समाज में संबोधन का महत्व अत्यधिक होता है और यह संवाद की बुनियाद है।
### वर्तमान समय में प्रासंगिकता
आज के युग में भी वैदिक काल की यह संबोधन परंपरा प्रासंगिक है। समाज में संवाद के तरीके बदल गए हैं, लेकिन सम्मान और सभ्यता का महत्व आज भी वैसा ही है। हमारे रोज़मर्रा के जीवन में 'बंधु' और 'आर्य' जैसे शब्दों का प्रयोग आपसी रिश्तों को मजबूत करने और सौहार्दपूर्ण माहौल बनाए रखने में सहायक हो सकता है। यह शब्द हमें यह सिखाते हैं कि किसी भी व्यक्ति के साथ संवाद करते समय उसमें सम्मान और अपनत्व का भाव होना चाहिए।
हमारे जीवन में सम्मानजनक संबोधन की परंपरा को पुनः अपनाना आज के सामाजिक विघटन के समय में अधिक आवश्यक है। यह हमें न केवल हमारे अतीत की समृद्ध सभ्यता से जोड़ता है, बल्कि वर्तमान समय में भी एक बेहतर और सौहार्दपूर्ण समाज की नींव रखता है।
### निष्कर्ष
वैदिक काल में 'आर्य' और 'बंधु' जैसे शब्द न केवल सभ्य समाज की परिभाषा थे, बल्कि एक सामाजिक अनुशासन और आदरपूर्ण संवाद का माध्यम भी थे। यह परंपराएं हमें सिखाती हैं कि संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपे सम्मान, अपनत्व और आदर को प्रकट करने का एक तरीका है। आज, जब हम विभिन्न समाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, हमें इस प्राचीन वैदिक परंपरा से प्रेरणा लेनी चाहिए और इसे अपने जीवन में पुनः स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।
इस प्रकार, वैदिक युग की यह संवाद परंपरा न केवल उस समय के समाजिक अनुशासन को बनाए रखने में सहायक थी, बल्कि आज के संदर्भ में भी एक बेहतर और सामंजस्यपूर्ण समाज के निर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
✍️आनन्द स्वरूप मेश्राम ✍️
विश्व हिन्दू परिषद जिला उपाध्यक्ष धमतरी