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दैनिक जीवन में आम हो गया है, लेकिन इसके अर्थ और संदर्भ को समझना आवश्यक है

 दैनिक जीवन में आम हो गया है, लेकिन इसके अर्थ और संदर्भ को समझना आवश्यक है
बंदा" शब्द मूलतः फारसी से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है "गुलाम" या "सेवक"। इसे आमतौर पर किसी के प्रति अधीनता या समर्पण के भाव में प्रयोग किया जाता है। इसके विपरीत, "बंधु" शब्द संस्कृत भाषा से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है "आत्मीय व्यक्ति" या "मित्र"। यह शब्द आपसी स्नेह, सम्मान और आत्मीयता को व्यक्त करता है।

आजकल लोग अपने निकटस्थ और प्रियजनों को "बंदा" कहकर संबोधित करने लगे हैं, जैसे—"हमने अपने बंदे को वहाँ भेजा है" या "उस बंदे से यह मंगवाया है"। यह शब्दावली, भले ही सामान्य बातचीत में सहज प्रतीत होती हो, लेकिन यह आत्मीयता और सम्मान का भाव नहीं दर्शाती है। यदि हम किसी अपने को "बंदा" कहते हैं, तो यह शब्द उसके प्रति अवहेलना या अपमान का संकेत दे सकता है, क्योंकि यह उसे किसी गुलाम या अधीनस्थ के रूप में प्रस्तुत करता है।

वहीं, "बंधु" शब्द आत्मीयता, स्नेह और सम्मान का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में भगवान विष्णु को "दीनबंधु" और "भक्तवत्सल" जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है। यह प्रसंग प्रसिद्ध है कि जब गज (हाथी) और ग्राह (मगर) का युद्ध हुआ, तो गज ने अपने कष्टों को भगवान विष्णु से निवेदन किया। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की पीड़ा सुनते ही, बैकुंठ से बिना चरणपादुका पहने ही गज को बचाने के लिए तत्काल प्रकट हो गए। यह उदाहरण दर्शाता है कि सच्चा आत्मीय व्यक्ति ही किसी के लिए इतना कुछ कर सकता है।

"बंधु" शब्द में भी यही भाव छिपा है, जो आत्मीयता, स्नेह और सम्मान को व्यक्त करता है। इसीलिए "बंधु" शब्द का प्रयोग करना अधिक उचित है, क्योंकि यह व्यक्ति की महत्ता और उसके प्रति हमारी आत्मीयता को प्रकट करता है। 

आखिरकार, भगवान के भक्त होते हैं, गुलाम नहीं। इसलिए, "बंधु" शब्द का चयन कर हम अपने प्रियजनों का सम्मान और आदर बनाए रख सकते हैं। आज से हम सभी यह संकल्प लें कि हम अपने आत्मीय व्यक्तियों को "बंदा" नहीं, "बंधु" कहकर संबोधित करेंगे, ताकि हमारी भाषा में भी उनका सच्चा मान-सम्मान झलके।
**धन्यवाद।**
✍️ *आनन्द स्वरूप मेश्राम* ✍️
जिला उपाध्यक्ष विश्व हिन्दू परिषद धमतरी

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