रेरा स्वीकृति, पंचायत एनओसी और सरकारी नियमों की अनदेखी के आरोप; सरकारी भूमि, नाली और किसानों के खेतों पर असर का दावा, ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग उठाई।
धमतरी। धमतरी शहर से लगे ग्राम पंचायत पोटियाडीह में बड़े पैमाने पर कथित अवैध प्लाटिंग का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों तथा स्थानीय लोगों का आरोप है कि कृषि भूमि का नियमों के विपरीत विखंडन कर करोड़ों रुपये का कारोबार किया जा रहा है। मामले में जिले के कुछ प्रभावशाली लोगों के नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
ग्रामीणों के अनुसार ग्राम पंचायत पोटियाडीह स्थित लगभग 3.50 एकड़ कृषि भूमि, जो कृष्णा देवांगन के नाम से बताई जा रही है, उसे लगभग 6.50 करोड़ रुपये में खरीदा गया। आरोप है कि इसके बाद बिना आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी किए भूमि के करीब 32 प्लॉट काट दिए गए और उन्हें लगभग 18 करोड़ रुपये में बिक्री की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पूरा मामला लंबे समय से क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
*बिना रेरा स्वीकृति और वैधानिक अनुमति के प्लाटिंग का आरोप*
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्लाटिंग के लिए न तो आवश्यक रेरा (RERA) की स्वीकृति ली गई और न ही संबंधित विभागों से विधिवत अनुमति प्राप्त की गई। लोगों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इससे भविष्य में प्लॉट खरीदने वाले लोगों को भी कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
*भू-माफियाओं का नया तरीका! बिना विकास कार्य किए कागजों में प्लॉट बेचने का आरोप*
ग्रामीणों का कहना है कि इस बार कथित तौर पर नया तरीका अपनाया गया है। आरोप है कि प्रशासन और मीडिया की नजरों से बचने के लिए मौके पर बड़े पैमाने पर मुरुम या सड़क निर्माण जैसे विकास कार्य नहीं किए गए, बल्कि केवल नक्शे के आधार पर कागजों में प्लॉट काटकर उनकी बिक्री शुरू कर दी गई। इससे पहली नजर में अवैध प्लाटिंग का पता लगाना भी मुश्किल हो रहा है।
*कलेक्टर आयोजन में व्यस्त, इधर करोड़ों की कृषि भूमि की कथित अवैध प्लाटिंग का खेल! 6.50 करोड़ में खरीदी गई जमीन के 18 करोड़ में बिकने के आरोप
पंचायत से एनओसी नहीं लेने का आरोप*
ग्रामीणों के अनुसार ग्राम पंचायत पोटियाडीह से किसी भी प्रकार की अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं ली गई। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि सामान्यतः भूमि विकास अथवा मिट्टी भराई जैसे कार्यों से पहले पंचायत की अनुमति आवश्यक होती है, लेकिन इस मामले में कथित रूप से ऐसी कोई प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। पंचायत के जिम्मेदार लोग भी अब कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।
*सरकारी भूमि, पुलिया और नाली पर अतिक्रमण के आरोप*
स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि प्लाटिंग के दौरान शासकीय भूमि के साथ-साथ नाली और पुलिया को भी पाट दिया गया। उनका कहना है कि इससे क्षेत्र में जल निकासी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है और बरसात के दौरान पानी का बहाव बाधित हो रहा है।
*50 से अधिक किसानों की फसल प्रभावित होने का दावा*
ग्रामीण किसानों का आरोप है कि मिट्टी भराई और कथित अवैध प्लाटिंग के कारण लगभग 50 से अधिक किसानों के खेतों से पानी की निकासी बंद हो गई है। खेतों में पानी भरने से फसल खराब होने लगी है, जिससे किसानों में भारी नाराजगी है। किसानों का कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
*पटवारी ने तहसीलदार को रिपोर्ट भेजने की कही बात*
मामले में संबंधित पटवारी से संपर्क किए जाने पर उन्होंने बताया कि कथित प्लाटिंग के संबंध में उन्हें जानकारी मिली थी। उनके अनुसार सत्यप्रकाश मुंजवानी नामक व्यक्ति द्वारा प्लाटिंग किए जाने की सूचना पर उन्होंने रिपोर्ट तैयार कर तहसीलदार को भेज दी है। अब आगे की कार्रवाई राजस्व विभाग के स्तर पर होना है।
*बिजली पोल हटाने पर भी उठे सवाल*
ग्रामीणों का आरोप है कि जिस स्थान पर कथित अवैध प्लाटिंग की जा रही है, वहां बिना पंचायत की अनुमति के बिजली पोल भी दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिए गए। लोगों का कहना है कि जहां एक सामान्य किसान को अपने खेत से बिजली पोल हटवाने के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, वहीं प्रभावशाली लोगों के मामलों में काम तेजी से हो जाता है। यदि यह आरोप सही हैं तो संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते हैं।
*कम दाम में खरीदी, महंगे दाम में बिक्री के आरोप*
स्थानीय लोगों का आरोप है कि किसानों से कम कीमत पर एकड़ के हिसाब से कृषि भूमि खरीदकर उसे छोटे-छोटे प्लॉटों में विभाजित किया जा रहा है और बाद में हजारों रुपये प्रति वर्गफुट की दर से बेचा जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो तो बड़े आर्थिक अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है।
*शासन को राजस्व नुकसान पहुंचने की आशंका*
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि गाइडलाइन मूल्य और वास्तविक लेन-देन में अंतर है तो इससे शासन को राजस्व तथा करों के रूप में करोड़ों रुपये की क्षति हो सकती है। उनका कहना है कि इस पूरे मामले की आयकर विभाग, राजस्व विभाग तथा अन्य संबंधित एजेंसियों से भी जांच कराई जानी चाहिए।
*मामले को दबाने की कोशिश के आरोप*
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मीडिया में खबरें प्रकाशित होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने पर मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
*जनप्रतिनिधियों पर भी उठे सवाल*
कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जनता द्वारा चुने गए कुछ जनप्रतिनिधि भी इस मामले में खुलकर आवाज उठाने के बजाय प्रभावशाली लोगों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जनप्रतिनिधि ही जनता की समस्याओं पर मौन रहेंगे तो आम लोगों का भरोसा कमजोर होगा।
*जांच और कार्रवाई की मांग*
ग्रामीणों, किसानों और स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि बिना अनुमति प्लाटिंग, सरकारी भूमि पर अतिक्रमण, जल निकासी बाधित करने या अन्य नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही प्लॉट खरीदने वाले लोगों के हितों की रक्षा के लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।
*अवैध प्लाटिंग पर कार्रवाई:* भू माफियों द्वारा अवैध रूप से बनाई गई कच्ची-पक्की सड़कों, मुरुम डालने के काम और अन्य ढांचों को गिरा देता है.
*खरीद-फरोख्त पर रोक*: ऐसे प्लॉटों की रजिस्ट्री, खरीद और बिक्री पूरी तरह से अवैध मानी जाती है और प्रशासन या अदालत के आदेश पर रोक लगा दी जाती है.
*कानूनी केस*: बिना टीएनसीपी (Town and Country Planning) अनुमति के प्लाटिंग करने वाले भू-स्वामियों और कॉलोनाइजरों पर मुकदमे दर्ज किए जाते हैं.
*सुविधाओं का अभाव*: ऐसे स्थानों पर स्थानीय निकाय द्वारा बिजली, पानी, नाली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं.