शरीर पर चोटों के निशान देख मां के नहीं रुक रहे आंसू — नगरी थाने की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
नशे के मामले में युवक की गिरफ्तारी का विरोध करने पहुंचा था युवक
, परिजनों का आरोप—कार्रवाई के नाम पर अमानवीय तरीके से की गई मारपीट; जुर्म दर्ज करने के बाद निकाला गया जुलूस, अब पुलिस की कार्यप्रणाली और मानवाधिकार पर सवाल
धमतरी/नगरी।
धमतरी जिले के नगरी थाना क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक युवक के साथ कथित मारपीट की तस्वीरें सामने आने के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। तस्वीरों में युवक के शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर चोट के निशान दिखाई दे रहे हैं।
परिजनों का आरोप है कि युवक किसी अन्य युवक की गिरफ्तारी का विरोध कर रहा था। इसी दौरान थाना प्रभारी के साथ कथित रूप से झूमाझटकी की स्थिति बनी। इसके बाद पुलिस ने युवक के खिलाफ अपराध दर्ज किया और कार्रवाई के दौरान उसके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई।
एक गलती की इतनी बड़ी सजा?
परिजनों का कहना है कि यदि युवक ने पुलिस के साथ अभद्रता या झूमाझटकी की थी तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी आरोपी को इस तरह पीटना कानूनन उचित है?
युवक के शरीर पर दिखाई दे रहे चोट के निशान पुलिस कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि युवक को इस हद तक पीटा गया कि उसकी हालत बेहद खराब हो गई।
जुर्म दर्ज करने के बाद जुलूस निकालने पर भी सवाल
मामले में एक और गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि अपराध दर्ज करने के बाद युवक को लेकर कथित तौर पर जुलूस क्यों निकाला गया? कानून हाथ में लेने वाले व्यक्ति के खिलाफ पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन क्या आरोपी को सार्वजनिक रूप से इस तरह ले जाना उचित प्रक्रिया का हिस्सा है?
यदि जुलूस निकाला गया था तो इसके आदेश और उद्देश्य क्या थे? क्या इसकी कोई आधिकारिक अनुमति या प्रक्रिया थी? इन सवालों का जवाब भी सामने आना चाहिए।
'घोर अपराधियों के साथ भी क्या ऐसी कार्रवाई होती है?'
परिजनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि अपराध कितना भी गंभीर हो, कानून अपना काम करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पुलिस हिरासत या कार्रवाई के दौरान किसी आरोपी के साथ मारपीट की जा सकती है?
अगर युवक ने पुलिसकर्मी के साथ झूमाझटकी की थी तो उसके खिलाफ कानूनी धाराओं में कार्रवाई का रास्ता मौजूद है। फिर चोट पहुंचाने की नौबत क्यों आई—यह जांच का विषय है।
मां की आंखों में आंसू, बेटे के शरीर पर चोट के निशान
युवक के परिजनों का कहना है कि जब मां ने अपने बेटे के शरीर पर चोट के निशान देखे तो वह भावुक हो उठीं। उनका सवाल है कि क्या न्याय दिलाने वाली पुलिस ही किसी परिवार के बेटे को इस हालत में पहुंचा सकती है?
परिजनों के अनुसार युवक पहले हिन्दू संगठन से भी सक्रिय रूप से जुड़ा रहा है और उसके खिलाफ पूर्व में इस तरह की कोई शिकायत सामने नहीं आई थी। हालांकि इस बात की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित रिकॉर्ड से होना आवश्यक है।
टीआई पर सवाल उठे तो दिखी 'पुलिसगिरी'?
परिजनों की ओर से यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि थाना प्रभारी से विवाद के बाद पुलिस ने व्यक्तिगत रूप से नाराज होकर युवक के साथ कठोर व्यवहार किया। हालांकि यह आरोप है और इसकी सच्चाई निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस कार्रवाई कानून के दायरे में हुई या गुस्से में सीमा पार की गई?
कहां गया मानवाधिकार?
किसी व्यक्ति पर अपराध दर्ज होना उसे उसके मूल अधिकारों से वंचित नहीं करता। हिरासत और पुलिस कार्रवाई के दौरान भी व्यक्ति के साथ कानून के अनुसार व्यवहार किया जाना जरूरी है। ऐसे में नगरी थाना मामले में निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
क्या पुलिस ने नियमों का पालन किया? क्या युवक के साथ मारपीट हुई? चोटें कैसे आईं? क्या मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख है? क्या पुलिसकर्मियों की बॉडी कैमरा/सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है? और क्या पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच होगी?
इन सवालों के जवाब अब पुलिस और प्रशासन से अपेक्षित हैं।
सबसे बड़ा सवाल—कानून की रक्षा करने वाली पुलिस खुद सवालों के घेरे में क्यों?
यह मामला सिर्फ एक युवक और पुलिस के बीच विवाद का नहीं है। यह सवाल पुलिस की जवाबदेही, हिरासत में व्यक्ति के अधिकार और कानून के समान रूप से लागू होने से जुड़ा है।
यदि युवक ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यदि पुलिसकर्मियों द्वारा नियमों से परे जाकर मारपीट की गई है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
नगरी थाना मामले में अब निगाहें पुलिस विभाग की अगली कार्रवाई पर हैं—क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी, या मामला महज एक और पुलिस कार्रवाई बनकर रह जाएगा?